युनिवार्सिटी में राजनीति भी अपने-अपने कैम्पों में रहती है/नीना गर्ग
अनेक समस्याओं से जूझती, संघर्ष करती, तमाम विरोधभासों का डटकर सामना करती उत्तरप्रदेश स्थित केंद्रीय मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ आज भी असामाजिक तत्वों व अतिवादी ताकतों का निशाना बनी हुई है. उसके अस्तित्व प़र उसके जन्म से ही सवाल उठाये जाते रहे हैं. कारण यह है कि वह मुसलमानों के बच्चों की तालीम हासिल करने का एक आधुनिक और प्रगतिशील शैक्षिक संस्थान है जिसने देश और विश्व को महान वैज्ञानिक, राजनेता, न्यायविद, दार्शनिक, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, अध्यापक और प्रशासनिक अधिकारी दिए हैं. प्रोफ़ेसर हरवंशलाल शर्मा इसी विश्वविद्द्यालय के कार्यकारी उपकुलपति भी रहे हैं. यहाँ के हिंदी-उर्दू विभाग ने मजाज़ लखनवी, राही मासूम रज़ा, शहरयार, बशीर बद्र, असगर वजाहत, उषा प्रेम्वदा, कुसुम अंसल, रंजन ज़ैदी और अनेक जानीमानी विभूतियों को जन्म दिया. इतिहास में प्रोफेसर इरफ़ान हबीब और प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन से भला कौन अपरिचित है.ये वे विभूतियाँ हैं जिनके नाम सेक्युलरिज़्म की ज़मानत हैं. लेकिन खुद अलीगढ़ का एक बड़ा अतिवादी गैर मुस्लिम वर्ग मुस्लिम युनिवार्सिटी को पसंद नहीं करता है क्योंकि मुस्लिम युनिवार्सिटी के पास जो सांस्कृतिक विरासत है, भाषा और जो तहजीब-अदब है, वह शहर के बारह्सेनी जैसे कालेजों में नहीं है और न ही सोच या चिंतन का खुला परिवेश। अधिकतर संभ्रांत हिन्दू परिवार मुस्लिम युनिवार्सिटी की इस सांस्कृतिक विरासत का आदर व सम्मान करते हैं और अपने बच्चों को इसी विश्वविद्यालय में पढने के लिए भेजते हैं। लेकिन मुट्ठीभर असामाजिक तत्त्व निरंतर शह्र के सांप्रदायिक सौहार्द्र और भाईचारे को समाप्त करने का प्रयास करते रहते हैं और निरंतर दुष-प्रचार में सक्रिय रहते है जिसका प्रभाव विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्रों प़र भी पड़ता है. इसी वर्ग ने एक बार विश्वविद्यालय के सामानांतर एक अन्य हिन्दू विश्वविद्यालय की बुनियाद डाली लेकिन तत्कालीन सरकार ने उसे स्वीकृति नहीं दी. किन्तु प्राप्त समाचारों के अनुसार अब फिर से प्रयास किये जा रहे हैं. उद्देश्य यह है की किसी भी सूरत से मुस्लिम युनिवार्सिटी के अल्प्संख्याकीय पहचान को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए. दुःख की बात यह है की इसी मुस्लिम युनिवार्सिटी का स्टाफ इसके अस्तित्व को समाप्त करने का मीर्जाफारी रोल निभाने में निरंतर सक्रिय होता जा रहा है. ऐसे हालात में नए उपकुलपति जनरल ज़मीरूद्दीन शाह की नियुक्ति एक नए चैलेन्ज से कम नहीं है. जनरल ज़मीरूद्दीन शाह फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के बड़े भाई हैं. खुद नसीर इसी मुस्लिम युनिवार्सिटी की देन हैं. अलीगढ मुस्लिम युनिवार्सिटी की दीवारें सुरक्षित नहीं हैं. कहीं से भी असामाजिक तत्व कैम्पस में पनाह लेने आ जाता है. ये असामाजिक तत्व मुस्लिम समुदाय से भी हो सकता है. युनिवार्सिटी में राजनीति भी अपने-अपने कैम्पों में रहती है जो छात्रों का समय-समय प़र इस्तेमाल करती है. बहुत से छात्र राजनीति में आने के उद्देश्य से ही यहाँ यूनियन का सहारा लेकर केंद्र के नेताओं के संपर्क में आते हैं. आज भी कई नेता, मंत्री और राजनीतिक परिवेक्षक इसी यूनियन के झंडे के नीचे से होकर राज्य और केंद्र की सत्ता तक पहुंचे. ऐसे लोग मात्र डिग्रियां लेते हैं, पढ़ने में रूचि नहीं. नए वीसी को इधर भी देखना होगा कि पढ़ने वाले छात्रों की सुरक्षा कैसे की जाए और कथित छात्र नेताओं से कैसे निपटा जाए. http://alpsankhyaktimes.blogspot.com

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