 |
| उत्तर प्रदेश का नया मुख्या मंत्री:अखिलेश यादव |
उत्तर प्रदेश का राजनीतिक सिनेरियो अब बदल चुका है. समाजवादी पार्टी का युवा नेता अखिलेश यादव अब उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास का पहला कमसिन मुख्यमंत्री होगा. मुलायम सिंह यादव और आज़म खां के इस दूरगामी फैसले ने समाजवादी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को सोची-समझी रणनीति के तहत एक तरह की मजबूती प्रदान कर दी है. यदि अखिलेश की राज्य के प्रशासन पर पकड़ मज़बूत बनी रही तो कालांतर में उत्तर प्रदेश निश्चय ही अपने पैरों पर खड़ा हो जायेगा. मुलायम सिंह यादव, अखिलेश और आज़म खां की राजनीतिक शैली पर निगाह डालते ही समझ में आ जाता है कि कांग्रेस नये जनमत संग्रह के बाद अब बहुत बड़े खतरे में आ चुकी है जहाँ से उसके अस्तित्व के स्थायित्व के लिए नई चुनौतियों के दरवाजे खुलने शुरू हो जाएंगे. सच्चाई यह है कि यह कांग्रेस के उस युग के अंत की दस्तक और राजनीति के अंत की वह सरगोशी भी है जिसने देश के लगभग हर वर्ग और जाति के बीच के फासलों को बढ़ाकर दशकों तक देश पर अंग्रेजों की तरह शासन किया और हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत और उपेक्षा का ज़हर फैलाकर देश को बेहद कमज़ोर करने का काम किया है जिसके चेहरे से नई पीढ़ी ने अब नकाब उतार दिया है. . सच्चाई यह है कि यह दरअसल RSS और BJP का वह मंच था जहाँ से शिकार तो होता था किन्तु शिकारी दिखाई नहीं देता था. RSS और BJP का स्पष्ट एजेंडा लोगों को समझ में आ जाता था, इसलिए जो लोग इसके एजेंडे से सहमत नहीं होते थे वे इससे दूर छिटक जाते थे लेकिन कांग्रेस अपने शिकार को किसी भी भ्रम में रहने का अवसर नहीं देती थी. इसे ही सेक्युलर-पोलिटिक्स का नाम दिया गया था. रफ्ता-रफ्ता उसकी यह आईडियालोजी भी अवसरवादी नेताओं के हाथों पहुंचकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई. बीजेपी ने तो अपनी सर्जरी कर दी, गुजरात इसका उदहारण है और उत्तर प्रदेश के चुनावों के परिणाम इसके सबूत. २००७ में समाजवादी पार्टी भी कुछ व्यावसायिक दलालों के शिकंजे में आ फँसी थी . उसके अपने भी तबादला इंडस्ट्री को प्रमोट करने में लग गए थे . स्थिति का लाभ उठाने के नजरिये से मुलायम सिंह यादव की दरियादिली का लाभ उन्हीं के भाई-बंधु तब खुलकर उठाने लगे. हफ्ता वसूली का कारोबार भी ऐसा चला कि सरकारी अधिकारी हताश होने लगे कि इससे तो मायावती की सरकार भली थी. लोहियाई-आईडियालोजी चीत्कार उठी थी. तभी से समाजवादी पार्टी की लोहियाई-आईडियालोजी का दौर भी समाप्त हो गया. आज उत्तर प्रदेश की वर्तमान समाजवादी राजनीति किसी भी आईडियालोजी और मूल्यों से प्रभावित नहीं रही है. आज का ग्रांड डिज़ाइन बदल चुका है जिसमें कहीं भी अन्ना अंडर-करंट की अनुभूति नहीं दिखाई दी. वास्तविकता यह है कि यह वोटों का पोलोरैज़ेशन था. जिससे कालांतर में कांग्रेस खेमे में भूकंप के झटके महसूस किये जायेंगे और २०१४ के आम चुनाव से पहले तक कांग्रेस अपने डिजास्टर मैनेजमेंट को चुस्त-दुरुस्त करने की कवायद करती रहेगी. प्रियंका गाँधी यदि एक के बाद एक करके इसी तरह आये अवसरों को गंवाती रहीं और राजनीति में नहीं आईं तो कांग्रेस का अंत बहुत दूर नहीं है. कारण यह है कि अब राज्यों में नया ध्रुवीकरण होने जा रहा है. राजनीतिक दर्शन के आभाव में चिंतन-मनन के समीकरण भी बदल चुके हैं. अब तो जो जनता में काम करेगा, वही देश में राज करने की स्थिति में आयेगा. जाति के आधार पर अब राज करना संभव नहीं होगा. उत्तर-प्रदेश में इधर कास्ट पोलिटिक्स का ज़हर घोलते हुए देश के कानून मंत्री ने मुस्लिम आरक्षण की बात की जिसे मुसलमानों ने ठुकरा दिया. सब जानते थे कि सलमान खुर्शीद फर्रुखाबाद की सीट से अपनी बेगम मैडम लुईस को जिताना चाहते थे. सब यह भी जानते थे कि सलमान खुर्शीद मुसलमानों का भला नहीं कर सकते. कांग्रेस पार्टी में उनकी स्थिति भी ठीक वैसी ही है जैसी बीजेपी में शाहनवाज़ और नकवी की है. इसलिए कांग्रेस कोफर्रुखाबाद की सीट गंवानी पड़ी. यही नहीं बल्कि कांग्रेस का संगठन और नेतृत्व भी उत्तर प्रदेश में बहुत कमज़ोर था. रीता बहुगुणा अवाम की पसंद नहीं थीं. ऐसे में उत्तर प्रदेश में कास्ट-पोलिटिक्स खेली गई. कास्ट पोलिटिक्स के राजनीतिक खेल में १९९१ में मायावती को बहुमत मिला था, लेकिन इस बार वोटर जानते थे कि मायावती चुनाव में पराजित हो जायेंगीं. क्योंकि उत्तर प्रदेश दूसरे राज्यों से पिछड़ गया था और जनता का ४० हज़ार करोड़ रुपया मायावती ने पत्थरों पर लगा दिया था. चुनाव के निकट आते ही हालाँकि माया ने ६ लोगों को भ्रष्टाचार में लिप्त पाकर हटाया भी, लेकिन भ्रष्टाचार ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे. ऐसी स्थिति में व्यवस्था-परिवर्तन तो स्वाभाविक था......
(जारी-2) alpsankhyaktimes94gzb.com., www.dw-world.de/hindi
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें