ग़ज़ल/रंजन जैदी
09415111271 alpsankhyaktimes94gzb.com बहता दरिया हूँ, समंदर में उतर जाने दे, फिर से लौट आऊंगा बस, भाप तो बन जाने दे. ताज और तख़्त किसी के भी वफ़ादार नहीं, मैं तो तारीख़ हूँ, औराक़ में बस जाने दे. लोग हर दौर में आते हैं चले जाते हैं, मैं मुहब्बत हूँ, कोई ताज तो बन जाने दे./ थक गया हूँ मैं कड़ी धूप में चलते-चलते, अब तो ज़ुल्फों की घनी छाओं में सो जाने दे./ है हवा तेज़ सफ़ीने भी हैं सहमे-सहमे, / बादबाँ रोक तू, तूफां को न पास आने दे./ आ कि हम उम्र के मौसम से मुहब्बत कर लें, खुशबुवों को भी मेरी नींद में बस जाने दे.

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