इसराइली राजदूत : दरगाह की ज़ियारत/नारायण बारेठ
बीबीसी हिंदी संवाददाता, जयपुर, इसराइली राजदूत (चित्रः दीपक शर्मा)
ऐसा पहली बार हुआ है कि इसराइल के राजदूत दरगाह की ज़ियारत करने आए हों.
अजमेर शरीफ़ में सूफ़ी संत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर एक अलग ही नज़ारा देखने में आया जब भारत में इसराइल के राजदूत मार्क सोफ़ेर ने वहाँ जा कर अक़ीदत के फूल पेश किए और अमन के लिए दुआ की.
सदियों पुरानी इस पवित्र दरगाह में ये पहला मौक़ा था जब किसी इसराइली राजदूत ने अपनी हाज़री दी हो.खुद सेफ़ोर ने कहा कि सूफ़ीवाद की तालीम और उसूलों से पूरे जहाँ को एक धागे में पिरोया जा सकता है.
सोफेर अपने साथियों के साथ अचानक दरगाह पहुंचे तो ख़ादिमों की संस्था अंजुमन के पदाधिकारियों ने उनकी अगवानी की.
एक खादिम के नाते हमने उनकी अगवानी की, ज़ियारत करवाई और मुसलमान होने के नाते हमने अपने जज़्बात से उन्हें रूबरू करवाया.
सरवर चिश्ती
इसराली राजदूत ने मज़ार शरीफ में चादर और अकीदत के फूल पेश किए. उस वक़्त रोज़ा इफ्तार का लम्हा आया तो दरगाह परिसर के आरकाट दालान में रोज़ेदारों ने रोज़ा खोला तो इसराइली राजदूत भी इसमें शरीक हुए.
एक खादिम के मुताबिक, सोफ़ेर वो सूफ़ियाना मंज़र देख कर बहुत प्रभावित हुए और कहा ये दिल पर गहरी छाप छोड़ता है.
इस मौक़े पर दरगाह के ख़ादिमों ने इसराइल में फ़लस्तीनियों के साथ हो रहे कथित दुर्व्यवहार पर नाराज़गी भी ज़ाहिर की.
नाराज़गी ज़ाहिर की
अंजुमन के एक सदस्य सरवर चिश्ती ने इसराइली राजदूत से साफ़ साफ़ कहा एक बार की हाजरी से चौदह सौ साल पुराना मसला हल नहीं हो सकता.
उनका कहना है, "हमने उनसे कहा कि इसराइल फ़लस्तीन में ज़ुल्मो सितम ख़त्म करे,ग़ज़ा पट्टी में फ़लस्तीनियों को उनका हक़ मिले. राज्य प्रायोजित आतंकवाद बंद हो, तभी शांति आ सकती है".
सरवर चिश्ती का कहना था, "एक खादिम के नाते हमने उनकी अगवानी की, ज़ियारत करवाई और मुसलमान होने के नाते हमने अपने जज़्बात से उन्हें रूबरू करवाया".
इसराइली राजदूत (चित्रः दीपक शर्मा)
राजदूत के साथ इसराइली दूतावास के कुछ अन्य लोग भी थे
हालाँकि कुछ ख़ादिमों ने सांकेतिक तौर पर सोफ़ेर के दरगाह में हाज़री देने पर नाराज़गी ज़ाहिर की लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ग़रीब नवाज़ का दर तो सबके के लिए खुला है.
एक ख़ादिम मोईन हसन चिश्ती ने बीबीसी से कहा, "यह तो एक महान फ़क़ीर की दरगाह है, इसके दरवाज़े तो सबके लिए खुले रहते है. हालाँकि नाराज़गी तो है. मगर इस महान हस्ती की चौखट पर तो कोई भी माथा टेक सकता है".
अंजुमन के एक सदस्य ने कहा कि सोफ़ेर की ऐसे ही अगवानी की गई जैसे ऐसे मौक़े पर किसी और ज़ायरीन की जाती है.
यह तो एक महान फ़क़ीर की दरगाह है, इसके दरवाज़े तो सबके लिए खुले रहते है. हालाँकि नाराज़गी तो है. मगर इस महान हस्ती की चौखट पर तो कोई भी माथा टेक सकता है
मुईन हसन चिश्ती
सोफेर आस्ताना से लौटे और आरकाट के दालान में आये तो रोज़ा खोला. वहीं उनकी दस्तारबंदी की गई.
ये दालान आरकाट के नवाब ने बनवाया था. वहीं पर अंजुमन का रजिस्टर मंगवाया गया जहाँ सोफ़ेर ने अपने विचार कलमबंद किये.
ये दरगाह वो मुक़द्दस मक़ाम है जो ना जात देखती है ना मज़हब. न रंग और न ही नस्ल. ये वो जगह है जहाँ दुनिया एकाकार नजर आती है. इसमें क्या राजा क्या रंक,ख़्वाजा के दरबार में तो सब बराबर है. उनमें एक राजदूत हो या कोई किसी मुल्क का हुक्मरान, सब बराबर हैं.
टिप्पणी/रंजन ज़ैदी : इतहास में यहूदियों से अरब के कबीलों से दोस्ती और दुश्मनी निरंतर रही है. इस्लाम ने यहूदियों प़र कभी यकीन नहीं किया. हालांकि यहूदियों में बड़े-बड़े वैज्ञानिक, दार्शनिक और विचारक पैदा हुए. यहूदियों के साथ द्वतीय विश्व्महायुद्ध में नाजियों द्वारा बेहद अमानवीय व्यवहार किये गए. लाखों यहूदी मार दिए गए. क़त्ल करने वाले लोग ईसाई थे. उन्हें उनकी जड़ों से उजाड़ने वाले भी ईसाई ही थे. मुसलमानों से ईसाइयों की हजारों सलीबी जंगें हुई हैं. ये लड़ाईयां अभी भी जारी हैं. यहूदियों से जो जंगें हुईं, उनके पीछे भी सलीबी सोच और चर्च की राजनीति रही है. अमेरिका के बसने और उसके विकसित होने तक इंग्लैंड के ताज के नगीने धुंधले पड़ने लगे थे. लेकिन अमेरिका में बसने वाले वही ईसाई परिवार थे जो ब्रिटिश-एम्पायर के नेशनल थे. ईसाइयत आज भी रोमन चर्च के ख़ुफ़िया १३-कोड आफ कन्डक्ट के दिशा-निदेशन में काम करती है. इंग्लैंड द्वारा यहूदियों को फिलिस्तीनियों की ज़मीन प़र बसाने का मूल कारण तत्कालीन राजनीतिक मजबूरी और यहूदियों से मुक्ति का रास्ता था. लेकिन चर्चिल के मस्तिष्क में एक भावी योजना भी थी-कालांतर में अरबों को कमज़ोर बनाये रखने की योजना, ताकि उनके पेट्रोल के बाज़ार को नियंतरण में रखा जा सके. उस योजना के विस्तार को दुनिया ने अपनी आँखों से देखा. लीबिया, सीरिया, सउदी अरब, क्वैत, इराक , अफगानिस्तान जैसे देश या तो तबाह हो गए या अमेरिका के समर्थक. इसराइल अमेरिका का सामरिक ठिकाना बना रहा. हालाँकि मुसलमानों की यहूदियों से बस इतनी लड़ाई रही है कि वे फिलिस्तीनियों की ज़मीन प़र काबिज़ हैं और उनका दमन करते रहते हैं. यहूदी जानते हैं कि जिस दिन फिलिस्तीन का मसला हल हो गया, उनकी दुश्मनी भी ख़त्म हो जाएगी. सलीबी सोच यही नहीं चाहती. यहूदी मूलतः व्यवसायी प्रवृति के होते हैं. लाभ-हानि उनका ईमान होता है. अमेरिका में उनकी ३६% इकोनोमी लगी हुई है. अमेरिका उनका सामरिक हितैषी है. बराक ओबामा भले ही लिबरल हों, किन्तु अमेरिका की नीतियां अधिक दिनों तक लिबरल नहीं रहेंगीं. ओबामा के बाद फिर कोई बुश आयेगा, कोई ब्लेयर पैदा होगा. यहूदी उस दिन तक का इंतज़ार करेंगे. लेकिन उनके बीच एक दूसरी सच्चाई भी है. उनकी स्मरण-शक्ति कमज़ोर नहीं हुई है. इसलिए उनके पास लम्बी भावी सामरिक योजनाएं हैं. स्थितिया उनके अनुकूल हो रही हैं. अरब अब कमज़ोर हो चुके है. ईमान की ताकत भी बट चुकी है. समय एक जैसा भी नहीं रहता है. अब ईरान की बढती ताकत उसके निशाने प़र है. हालाँकि वह जानता है कि ईरान वक्त आने प़र अरब की हिफाज़त में कभी आड़े नहीं आयेगा. लेकिन वह खाना-ए-काबा को यहूदियों के बूटों से रौंदते हुए भी कभी देखना पसंद नहीं करेगा. दीवारे-गिरिया और मस्जिद-ए-अक्सा का अपमान वह देख चुका है. इसलिए यहूदियों की भावी योजनाओं को शायद वह सतही स्तर प़र भी नहीं लेता होगा. शायद उसे अपनी सीमाओं की सुरक्षा करनी है. यह भी सम्भावना है कि वह कभी भी अपने मुल्क को इराक नहीं बनने देगा. क्योंकि उसके पास ईमान की ताकत भी है, जिसके बल प़र इस्लाम सारी दुनिया में फैला था. . भारत में यहूदियों की सरगर्मियों प़र सरकार की कितनी नज़र है, कहना मुश्किल है. लेकिन इसपर नज़र रखनी चाहिए. पूना और मुंबई हादसों में अन्य आतंकवादियों के साथ-साथ यहूदियों की सरगर्मियां भी संदेह के घेरे में रही हैं. मोसाद की योजनाएं अभी परदे में है. इस्राईल के राजदूत मार्क सोफेर का अचानक अजमेर की दरगाह पहुंचना भले ही खतरे की कोई घंटी न हो, मार्क सोफेर भले ही सूफियाना रंग में रंग गए हों, प़र यह विज़िट किसी भावी खतरे से कम भी नहीं है. वहां हर दिन हजारों हिन्दू-मुस्लिम भक्तगण जियारत को आते हैं. यहूदियों की मौजूदगी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. कामनवेल्थ गेम्स शुरू होने वाले हैं. भारत की इज्ज़त दांव प़र लगी हुई है. अजमेर में भी महत्वपूर्ण लोग आएंगे. सरकार और प्रशासन इसमें व्यस्त है. मार्क सोफेर के दिल में ऐसे समय में अजमेर की दरगाह से मुहब्बत पैदा हो जाना माने रखता है. वास्तविकता यह है कि जो जानते हैं, वे समझ सकते हैं कि यहूदी अपने धर्म और आस्थाओं में कट्टर होते हैं. उनके मसलक में मजारों में जाना गुनाह माना जाता है, तब फिर....?
ऐसा पहली बार हुआ है कि इसराइल के राजदूत दरगाह की ज़ियारत करने आए हों.
अजमेर शरीफ़ में सूफ़ी संत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर एक अलग ही नज़ारा देखने में आया जब भारत में इसराइल के राजदूत मार्क सोफ़ेर ने वहाँ जा कर अक़ीदत के फूल पेश किए और अमन के लिए दुआ की.
सदियों पुरानी इस पवित्र दरगाह में ये पहला मौक़ा था जब किसी इसराइली राजदूत ने अपनी हाज़री दी हो.खुद सेफ़ोर ने कहा कि सूफ़ीवाद की तालीम और उसूलों से पूरे जहाँ को एक धागे में पिरोया जा सकता है.
सोफेर अपने साथियों के साथ अचानक दरगाह पहुंचे तो ख़ादिमों की संस्था अंजुमन के पदाधिकारियों ने उनकी अगवानी की.
एक खादिम के नाते हमने उनकी अगवानी की, ज़ियारत करवाई और मुसलमान होने के नाते हमने अपने जज़्बात से उन्हें रूबरू करवाया.
सरवर चिश्ती
इसराली राजदूत ने मज़ार शरीफ में चादर और अकीदत के फूल पेश किए. उस वक़्त रोज़ा इफ्तार का लम्हा आया तो दरगाह परिसर के आरकाट दालान में रोज़ेदारों ने रोज़ा खोला तो इसराइली राजदूत भी इसमें शरीक हुए.
एक खादिम के मुताबिक, सोफ़ेर वो सूफ़ियाना मंज़र देख कर बहुत प्रभावित हुए और कहा ये दिल पर गहरी छाप छोड़ता है.
इस मौक़े पर दरगाह के ख़ादिमों ने इसराइल में फ़लस्तीनियों के साथ हो रहे कथित दुर्व्यवहार पर नाराज़गी भी ज़ाहिर की.
नाराज़गी ज़ाहिर की
अंजुमन के एक सदस्य सरवर चिश्ती ने इसराइली राजदूत से साफ़ साफ़ कहा एक बार की हाजरी से चौदह सौ साल पुराना मसला हल नहीं हो सकता.
उनका कहना है, "हमने उनसे कहा कि इसराइल फ़लस्तीन में ज़ुल्मो सितम ख़त्म करे,ग़ज़ा पट्टी में फ़लस्तीनियों को उनका हक़ मिले. राज्य प्रायोजित आतंकवाद बंद हो, तभी शांति आ सकती है".
सरवर चिश्ती का कहना था, "एक खादिम के नाते हमने उनकी अगवानी की, ज़ियारत करवाई और मुसलमान होने के नाते हमने अपने जज़्बात से उन्हें रूबरू करवाया".
इसराइली राजदूत (चित्रः दीपक शर्मा)
राजदूत के साथ इसराइली दूतावास के कुछ अन्य लोग भी थे
हालाँकि कुछ ख़ादिमों ने सांकेतिक तौर पर सोफ़ेर के दरगाह में हाज़री देने पर नाराज़गी ज़ाहिर की लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ग़रीब नवाज़ का दर तो सबके के लिए खुला है.
एक ख़ादिम मोईन हसन चिश्ती ने बीबीसी से कहा, "यह तो एक महान फ़क़ीर की दरगाह है, इसके दरवाज़े तो सबके लिए खुले रहते है. हालाँकि नाराज़गी तो है. मगर इस महान हस्ती की चौखट पर तो कोई भी माथा टेक सकता है".
अंजुमन के एक सदस्य ने कहा कि सोफ़ेर की ऐसे ही अगवानी की गई जैसे ऐसे मौक़े पर किसी और ज़ायरीन की जाती है.
यह तो एक महान फ़क़ीर की दरगाह है, इसके दरवाज़े तो सबके लिए खुले रहते है. हालाँकि नाराज़गी तो है. मगर इस महान हस्ती की चौखट पर तो कोई भी माथा टेक सकता है
मुईन हसन चिश्ती
सोफेर आस्ताना से लौटे और आरकाट के दालान में आये तो रोज़ा खोला. वहीं उनकी दस्तारबंदी की गई.
ये दालान आरकाट के नवाब ने बनवाया था. वहीं पर अंजुमन का रजिस्टर मंगवाया गया जहाँ सोफ़ेर ने अपने विचार कलमबंद किये.
ये दरगाह वो मुक़द्दस मक़ाम है जो ना जात देखती है ना मज़हब. न रंग और न ही नस्ल. ये वो जगह है जहाँ दुनिया एकाकार नजर आती है. इसमें क्या राजा क्या रंक,ख़्वाजा के दरबार में तो सब बराबर है. उनमें एक राजदूत हो या कोई किसी मुल्क का हुक्मरान, सब बराबर हैं.
टिप्पणी/रंजन ज़ैदी : इतहास में यहूदियों से अरब के कबीलों से दोस्ती और दुश्मनी निरंतर रही है. इस्लाम ने यहूदियों प़र कभी यकीन नहीं किया. हालांकि यहूदियों में बड़े-बड़े वैज्ञानिक, दार्शनिक और विचारक पैदा हुए. यहूदियों के साथ द्वतीय विश्व्महायुद्ध में नाजियों द्वारा बेहद अमानवीय व्यवहार किये गए. लाखों यहूदी मार दिए गए. क़त्ल करने वाले लोग ईसाई थे. उन्हें उनकी जड़ों से उजाड़ने वाले भी ईसाई ही थे. मुसलमानों से ईसाइयों की हजारों सलीबी जंगें हुई हैं. ये लड़ाईयां अभी भी जारी हैं. यहूदियों से जो जंगें हुईं, उनके पीछे भी सलीबी सोच और चर्च की राजनीति रही है. अमेरिका के बसने और उसके विकसित होने तक इंग्लैंड के ताज के नगीने धुंधले पड़ने लगे थे. लेकिन अमेरिका में बसने वाले वही ईसाई परिवार थे जो ब्रिटिश-एम्पायर के नेशनल थे. ईसाइयत आज भी रोमन चर्च के ख़ुफ़िया १३-कोड आफ कन्डक्ट के दिशा-निदेशन में काम करती है. इंग्लैंड द्वारा यहूदियों को फिलिस्तीनियों की ज़मीन प़र बसाने का मूल कारण तत्कालीन राजनीतिक मजबूरी और यहूदियों से मुक्ति का रास्ता था. लेकिन चर्चिल के मस्तिष्क में एक भावी योजना भी थी-कालांतर में अरबों को कमज़ोर बनाये रखने की योजना, ताकि उनके पेट्रोल के बाज़ार को नियंतरण में रखा जा सके. उस योजना के विस्तार को दुनिया ने अपनी आँखों से देखा. लीबिया, सीरिया, सउदी अरब, क्वैत, इराक , अफगानिस्तान जैसे देश या तो तबाह हो गए या अमेरिका के समर्थक. इसराइल अमेरिका का सामरिक ठिकाना बना रहा. हालाँकि मुसलमानों की यहूदियों से बस इतनी लड़ाई रही है कि वे फिलिस्तीनियों की ज़मीन प़र काबिज़ हैं और उनका दमन करते रहते हैं. यहूदी जानते हैं कि जिस दिन फिलिस्तीन का मसला हल हो गया, उनकी दुश्मनी भी ख़त्म हो जाएगी. सलीबी सोच यही नहीं चाहती. यहूदी मूलतः व्यवसायी प्रवृति के होते हैं. लाभ-हानि उनका ईमान होता है. अमेरिका में उनकी ३६% इकोनोमी लगी हुई है. अमेरिका उनका सामरिक हितैषी है. बराक ओबामा भले ही लिबरल हों, किन्तु अमेरिका की नीतियां अधिक दिनों तक लिबरल नहीं रहेंगीं. ओबामा के बाद फिर कोई बुश आयेगा, कोई ब्लेयर पैदा होगा. यहूदी उस दिन तक का इंतज़ार करेंगे. लेकिन उनके बीच एक दूसरी सच्चाई भी है. उनकी स्मरण-शक्ति कमज़ोर नहीं हुई है. इसलिए उनके पास लम्बी भावी सामरिक योजनाएं हैं. स्थितिया उनके अनुकूल हो रही हैं. अरब अब कमज़ोर हो चुके है. ईमान की ताकत भी बट चुकी है. समय एक जैसा भी नहीं रहता है. अब ईरान की बढती ताकत उसके निशाने प़र है. हालाँकि वह जानता है कि ईरान वक्त आने प़र अरब की हिफाज़त में कभी आड़े नहीं आयेगा. लेकिन वह खाना-ए-काबा को यहूदियों के बूटों से रौंदते हुए भी कभी देखना पसंद नहीं करेगा. दीवारे-गिरिया और मस्जिद-ए-अक्सा का अपमान वह देख चुका है. इसलिए यहूदियों की भावी योजनाओं को शायद वह सतही स्तर प़र भी नहीं लेता होगा. शायद उसे अपनी सीमाओं की सुरक्षा करनी है. यह भी सम्भावना है कि वह कभी भी अपने मुल्क को इराक नहीं बनने देगा. क्योंकि उसके पास ईमान की ताकत भी है, जिसके बल प़र इस्लाम सारी दुनिया में फैला था. . भारत में यहूदियों की सरगर्मियों प़र सरकार की कितनी नज़र है, कहना मुश्किल है. लेकिन इसपर नज़र रखनी चाहिए. पूना और मुंबई हादसों में अन्य आतंकवादियों के साथ-साथ यहूदियों की सरगर्मियां भी संदेह के घेरे में रही हैं. मोसाद की योजनाएं अभी परदे में है. इस्राईल के राजदूत मार्क सोफेर का अचानक अजमेर की दरगाह पहुंचना भले ही खतरे की कोई घंटी न हो, मार्क सोफेर भले ही सूफियाना रंग में रंग गए हों, प़र यह विज़िट किसी भावी खतरे से कम भी नहीं है. वहां हर दिन हजारों हिन्दू-मुस्लिम भक्तगण जियारत को आते हैं. यहूदियों की मौजूदगी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. कामनवेल्थ गेम्स शुरू होने वाले हैं. भारत की इज्ज़त दांव प़र लगी हुई है. अजमेर में भी महत्वपूर्ण लोग आएंगे. सरकार और प्रशासन इसमें व्यस्त है. मार्क सोफेर के दिल में ऐसे समय में अजमेर की दरगाह से मुहब्बत पैदा हो जाना माने रखता है. वास्तविकता यह है कि जो जानते हैं, वे समझ सकते हैं कि यहूदी अपने धर्म और आस्थाओं में कट्टर होते हैं. उनके मसलक में मजारों में जाना गुनाह माना जाता है, तब फिर....?
tab fir.......aap poora sach bolte bolte ruk gaye aisa hamesha se hota aaya hai aur hota rahega ki apne sach ko bolne ke liye hame ghumavdar raston ko talash karte rahna hoga.......aur jhooth ko 1000 baar bol kar sach banane wale hamare samne seena tane jhuth ko sach banate rahenge. kyonki ham 'sampradayik' nahi hain......
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