एक फर्लांग का सफ़रनामा/रंजन जैदी

अभी पिछले दिनों मेरा लखनऊ जाना हुआ वहां के एक पत्रकारमित्र अनुपम पाण्डे मेरे गेस्ट हाउस मुझसे मिलने आये और माया सरकार के विकासात्मक कार्यों पर चर्चा की जिसमें नए लखनऊ के विस्तार और उन पार्कों का भी ज़िक्र आया (जिनमें काशीराम के साथ मायावती अपना पर्स लिए गेट पर खड़ी दिखाई देती हैं) तो मायावती के हाथियों और आधुनिक मुग़ल गार्डेन को देखने की इच्छा मेरे मन में भी जागृत हो उठी जाकर देखा बेहद खूबसूरत मायावती का स्याह चेहरा अच्छा नहीं लगा. मुग़ल बादशाह संगेमरमर को पसंद करते थे बादशाहत में भी नफासत होती है, माया यही गुर नहीं समझ पाईं. पत्थर बदले, पैसा खर्च किया पर चेहरे की कालिमा लालिमा में तब्दील नहीं हो पाई कहते हैं कि करोंड़ों रूपये फूँक दिए माया-गार्डेन के लिए, पर मायावती जनता का दिल नहीं पाईं। पुराने लखनऊ की बोसीदा इमारते वक्त के इस इन्कलाब पर बेहद उदास है उनकी मरम्मत और देखभाल के लिए माया के पास पैसा नहीं है सुबह-सुबह शहर देखने गया, नालियों से उबलता पानी सड़कों पर फैल गया था कहीं भी विकास का नमो-निशान नहीं बारादरी का गेट बस खड़ा ही है, शायद अपना इतिहास बताने के लिए बेहद जर्जर अवस्था में पुराना लखनऊ , उसकी तहजीब, उसकी खुशहाली लखनऊ की आती-जाती सरकारों ने बदरंग पेंटिंग में बदल कर रख दिया है, बेहद दुःख के साथ कह रहा हूँ कि पुराना लखनऊ तो शाएद बहुत पहले ही चुका हैअब तो बस वह इतिहास का एक शहर भर रह गया है। नवाब अच्छे थे या बुरे, अब नहीं रहे। रह गए हैं उनके लकब जो लोग अपने नाम से पहले लगाकर अपनी इज्ज़त कराना चाहते हैं जैसे लखनऊ का नवाब, दिल्ली का नवाब, हंसी आती है। मायावती की सरकार अगले चुनाव में अपनी सरकार नहीं बना पायेगी। मुलायम की पार्टी अब अपना दम तोड़ चुकी है। उत्तर प्रदेश का यूथ कांग्रेस के साथ आगया है। बदलाव ज़रूरी भी है। लूट-खसोट की राजनीति बहुत दिनों तक न चल पाए, किन्तु वह पूरी तरह से ख़त्म नहीं होगी। मोहमाया का आकर्षण ही ऐसा है। मायावती की सरकार के जाने का कारण उसकी अपनी घटिया नीतियाँ और आत्ममोह तथा विकास का न होना है। दिल्ली-अलीगढ रोड नहीं, मौत का रास्ता है। सड़क अब है ही नहीं। रास्ते में आपको कितनी ही छोटी कारें दुर्घटनाग्रस्त मिल जायेंगीं, कितने ट्रक, कितनी बसें, कितने टैम्पू हादसे की कहानियां सुनाने के लिए आपके सामने होंगें। जनता को पार्क या हाथी नहीं, सड़कों की ज़रुरत है, विकास की ज़रुरत है. 

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