'अमादुस्सादात' में पानीपत के अंतिम युद्ध का महत्वपूर्ण वर्णन /Ranjan Zaidi

विशेष    
                                                      पानीपत का अंतिम युद्ध साधारण नहीं था                                                                                                             रंजन ज़ैदी  
   तिहास की परतें खोलें तो कुछ राज़ स्वतःही  सामने आ जायेंगे.
उत्तर प्रदेश का एक शहर है रायबरेली. कभी, उसके  तत्कालीन फ़ारसी के विद्वान सैयद ग़ुलाम अली नक़वी (वल्द सैयद हकीम मुहम्मद अकमल खां) जो शाहआलम (बादशाह दिल्ली)  के निजी हकीम और वलीअहदे-सल्तनत अकबर सानी की सल्तनत में मुख़्तार-ए-कारी थे, 1302 हिजरी में रोहेला ग़ुलाम क़ादिर ने खंजर की नोक से शाहआलम (बादशाह दिल्ली)  की ऑंखें निकाल लीं और क़िले की दौलत को लूटकर वहां से भाग गया था.पानीपत भागने वालों में हकीम सैयद मुहम्मद अकमल खां भी थे जो दिल्ली छोड़कर हैदराबाद और फिर वहां से मदीना-ए-अक़दस की ज़्यारत को चले गए लेकिन सैयद ग़ुलाम अली नक़वी अपने वालिद के साथ हज करने नहीं गए. 
      1213  हिजरी में सैयद ग़ुलाम अली नक़वी के वालिद का देहावसान हो गया और नक़वी लखनऊ में आकर पुनः बस गए. उन दिनों लखनऊ के तत्कालीन रेज़िडेंट मिस्टर पामर थे और पामर नक़वी को बहुत पसंद करते थे. जब पामर पूना के रेज़िडेंट बने तो उन्होंने लखनऊ के नए रेज़िडेंट मिस्टर जान बेली को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने सैयद ग़ुलाम अली नक़वी की बहुत प्रशंसा की थी जिससे प्रभावित होकर जॉन बेली ने सैयद ग़ुलाम अली नक़वी को अपने विभाग में अपना मीर मुंशी बना लिया और इस तरह वह लखनऊ के तत्कालीन नवाब सादत अली खां के संपर्क में आकर जॉन बेली के अनरोध पर  1223 में 'तारीखे-अवध' लिखी और उसका नाम 'अमादुस्सादात' रखा.
 
      'अमादुस्सादात' में पानीपत के अंतिम युद्ध का महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है जिसका सम्पूर्ण वर्णन यहाँ संभव नहीं है. यह पुस्तक दरअस्ल पानीपत के युद्ध का शायद अंतिम आँखों देखा हाल रहा होगा जिसमें मुसलमानों के एक नए इतिहास की शुरुआत होती है और  सियासी अदूरदर्शिता, शैक्षिक पिछड़ेपन, धार्मिक-कट्टरतावाद और सामाजिक व आर्थिक पतन के जन्म की एक तस्वीर देखने को मिलती है. 
      1947 का वर्ष देश के विभाजन का साल था और 1971 पाकिस्तान के भी दो हिस्से बंट जाने का वर्ष रहा. यह वर्ष एक नए देश 'बांग्ला देश' के जन्म का साल रहा. आज जो पाकिस्तान की स्थिति है, उससे पता चलता है कि वह देश अभी एक और नए विभाजन के साहिल पर पहुँच चुका है. इस्लामिक-कट्टरतावाद का यही मात्र अंत नहीं है. इसकी आग में  अफगानिस्तान भी धीरे-धीरे सुलगता जा रहा है. जबकि वह स्वयं 20 वर्ष तक अमेरिकी-आतंकवाद का शिकार रह चुका है. (/-जारी....2) बहुत
                                                                                                                   Ranjan Zaidi
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को दिशा प्रदान करती है.twitter@ranjanzaidi786.com, -लेखक: Ranjan Zaidi

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