@हिंदी के मुस्लिम साहित्यकार /नासिरा शर्मा : हिन्दी साहित्य का तनावर दरख़्त /अब्दुल ग़फ़्फ़ार
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| -- | आलेख - अब्दुल ग़फ़्फ़ार gaffar607@gmail.comजिसकी जड़ें हिन्दुस्तानी संस्कृति में काफ़ी दूर तक फैली हुई हैं हिन्दी साहित्य का दायरा वसीअ करने वाली हिन्दी की सुविख्यात साहित्यकार मोहतरमा नासिरा शर्मा जी साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने वाली पहली मुसलमान महिला लेखिका हैं। कहानी, अफ़साने, नाटक, उपन्यास, रिपोर्ताज़, बाल साहित्य, कविताएं, नज़्में, संपादन, अनुवाद, निबंध, आलेख, कथा-पटकथा-संवाद जैसी विभिन्न विधाओं पर क़लम चलाने वाली नासिरा शर्माजी विनम्रता की प्रतिमूर्ति बनी एक फलदार दरख़्त की मानिंद झुकी नज़र आती हैं। इस उम्र में भी वो साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने की निरंतर कोशिशें करती रहती हैं। अपने जीवनकाल में ही किवदंती बन चुकी नासिरा शर्मा जी हम जैसे नए लेखकों के लिए पथप्रदर्शक का काम कर रही हैं। 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' उनके उपन्यास 'पारिज़ात' के लिए 2016 में मिला था। 'व्यास सम्मान' उनके उपन्यास 'काग़ज़ की नाव' के लिए 2019 में मिला। 'महात्मा गांधी सम्मान' हिन्दी संस्थान लखनऊ, और उसके अलावा दर्जनों अन्य पुरस्कार और सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं। अभी हाल में सद्भावना के लिए गुजरात में उन्हें 'लाइफ टाइम सर्विस टू इंडियन कल्चर' अवार्ड से सम्मानित किया गया। अब तो सम्मान भी उनके हाथों में जाकर ख़ुद को सम्मानित महसूस करते हैं। 22 अगस्त 1948 में उनकी की पैदाइश इलाहाबाद ज़िले के मुस्तफ़ाबाद गाँव में हुई थी। उनके वालिद मरहूम ज़ामिन अली उर्दू के प्रोफ़ेसर व उम्दा शायर थे। नासिरा शर्मा जी ने फ़ारसी ज़बान व अदब से एम.ए. किया। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी, फ़रसी व पश्तो भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ है। उन्होंने तीन वर्षों तक जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाने का काम भी किया। हर भाषा को एक दूसरे की पूरक मानने वाली नासिरा शर्मा जी किसी ख़ास भाषा को किसी ख़ास मज़हब से जोड़ने की पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करती हैं। उनका मानना है कि अदब की बात करने वाले हर ज़बान से मुहब्बत करते हैं। यही वजह है कि उनकी रचनाओं के किरदार कभी ‘ख़्वाब’ बुनते हैं तो कभी ‘सपने’ देखते हैं। उनकी मादरी ज़बान उर्दू है, वह हिंदी में साहित्य रचना करती हैं और पढाई के दौरान फ़ारसी उनका सब्जेक्ट रहा है। इसलिए उन्हें सभी भाषाएं अपनी सी लगती हैं। उनका मानना है कि सियासत ने उर्दू को एक ख़ास मज़बह से जोड़ दिया है वर्ना हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों के मुक़ाबले उर्दू की कहीं ज़्यादा ख़िदमत की है। वहीं हिंदी के बहुत से लेखकों की पृष्ठभूमि उर्दू ही रही है, जिसकी वजह से उनकी रचनाओं की भाषा में एक अलग तरह की रवानगी नज़र आती है। उत्कृष्ट आदर्शों और उत्तम संस्कारों में पली बढीं स्त्री की आंखें कितनी खुली हुई और रौशन हो सकती हैं इसका अंदाज़ा नासिरा जी की गुफ़्तुगू से लगाया जा सकता है। यही वजह है कि नासिरा शर्मा जी को समाज में किसी तरह की कोई दीवार नज़र नहीं आती। उनका दिमाग़ poo री तरह से खुला हुआ और रौशन है। उनके स्वभाव की सरलता, उदारता और उनका हंसमुख व्यक्तित्व अनायास ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। उनकी छवि एक बेहद ही स्पष्टवक्ता की रही है। खरी-खरी कहने की उनकी आदत उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उनकी शादी डॉ. रामचंद्र शर्मा जी से हुई जो आला दर्जे के विद्वान, इमानदार और साहसी क़िस्म के व्यक्ति माने जाते थे। कॉमन वेल्थ स्कालरशिप से सम्मानित शर्मा जी ‘ओशनोग्राफी’ नामक बेहद ही चर्चित पुस्तक के लेखक भी हैं। इलाहाबाद में अध्यापन करने के बाद वो जे.एन.यू. के स्कूल ऑफ़ इन्टरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफेसर के पद पर आसीन हुए। यहाँ उनके आध्यापन का विषय ज्योपॉलिटिक्स रहा। अपने निजी जीवन में नासिरा शर्मा जी मज़हब-ए-इस्लाम को मानती हैं, बावजूद इसके वो कभी भी दूसरे धर्मों की मान्यताओं को मानने या उनका पालन करने से गुरेज़ नहीं करतीं। उनका परिवार गंगा जमुनी संस्कृति का उच्चतम नमूना है। नासिरा शर्मा जी का जीवन धर्मनिरपेक्षता का पर्याय तो है ही, वो वैचारिक रूप से भी सर्वधर्म समभाव की हिमायती रही हैं। नासिरा शर्मा जी की परवरिश ही साहित्यिक परिवेश में हुई। उनके घर में गज़लों, नज़्मों, अफ़सानों वग़ैरह को पढने लिखने का चलन शुरू से ही रहा। अपने बचपन के हालात बयान करते हुए वो बताती हैं - "हमारे यहाँ सांस लेने की तरह लिखा-पढ़ा जाता था। हमारी सात पुश्तें तक अदब से बिल्कुल गहरे से जुड़ीं थीं। घर का माहौल ऐसा था जिसमें हिन्दी औरहिन्दू, उर्दू और मुसलमान, अरबी और फ़ारसी के बीच कभी कोई त्अस्सुब, कोई भेदभाव नही रहा।" अपने घरेलू हालात बयान करते हुए कहती हैं - ‘‘बचपन में मुझे घर सजाने का बड़ा शौक़ था। घर-गृहस्थी में शुरू से ही मेरी गहरी दिलचस्पी रही। दो बहनों की शादी के बाद, मेरी शादी से पहले तक घर की सारी ज़िम्मेदा मेरे ही ज़िम्मे थी।” "इंसानी आवाज़ें मशीन गन की आवाज़ों में डूबकर लाशों के अंबार में ढल गई थीं। चिनार के पेड़ों की शाखाओं ने अपनी गर्दनें झुका ली थीं और उनपर बैठी चिड़ियां अपना घोंसला छोड़कर, चीखती जाने किस वीराने की ओर उड़ गई थीं।" यह एक पाराग्राफ ही उनकी भाषा शैली की विशिष्टता से पाठकों को परिचकराने के लिए काफ़ी है।https://alpst-poltics.blogspot.com/2022/05/blog-post.html साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता में भी उन्होंने बड़ा काम किया है। इरा़क़, अ़फ़गानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान व भारत सहित अन्य देशों के शीर्षस्थ राजनीतिज्ञों, प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों, मज़हबी रहनुमाओं, साहित्यकार, शोअरा, फ़नकार वग़ैरह का इंटरव्यू लेना उस दौर में दुनिया की किसी भी एशियाई महिला के लिए जू-ए-शीर लाने के बराबर था। एक तो महिला ऊपर से मुसलमान और उसके ऊपर भारतीय, लेकिन नासिरा जी ने ये कारनामा कर दिखाया था। आयतुल्लाह ख़ुमैनी, आयतुल्लाह ख़ामनई, हाशमी रफसंजानी, मोहम्मद रजाई, डाक्टर बेहिश्ती, हमद शामलू, गौहर मुराद, इस्माइल खुई, शाहपोर बख़्तियार, लतीफ़ एन जासिम, अब्दुल्लाह ख़िदमतगार... वग़ैरह चंद नाम उस फ़ेहरिस्त से हैं जिन हस्तियों का साक्षात्कार नासिरा शर्मा जी ने किया था। वह ईरानी समाज और राजनीति के अलावा वहां के साहित्य, कला व सांस्कृतिक विषयों की विशेषज्ञ रही हैं। ईरानी युद्धबंदी बच्चों को इराक़ के ‘रमादी कैम्प' से रिहा कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिसमें फ़्रेंच पत्रकार फ़िलिप शाँतले व जर्मन टीवी पत्रकार नवीना सुंदरम् का साथ रहा। इस कोशिश में घटित एक घटना का ज़िक्र करते हुए वो बताती हैं - "किसी फ्रेंच जर्नलिस्ट ने बताया कि ख़ुमैनी साहब लगातार कह रहे हैं कि ये 100 बच्चे मेरे नहीं हैं और सद्दाम हुसैन कह रहे हैं कि बॉर्डर पे पकड़े गए सारे बच्चे उनके हैं, वो इन्हें वापस लें। लिहाज़ा उन बच्चों को ठिकाने पर पहुंचाना हम जर्नलिस्टों की ज़िम्मेदारी थी, लेकिन सभी जर्नलिस्ट फ़ारसी भाषा से अनभिज्ञ थे। मैंने फ्रेंच जर्नलिस्ट से कहा कि मैं उन बच्चों से फ़ारसी में बात कर हक़ीक़त का पता लगा सकती हूँ।" "एक बच्चे का पैर नही था। मैंने उससे पूछा बेटे आप का नाम क्या है? उसने बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम पढ़ी और कहा कि मैं आप से बात नही करुँगा। इसलिए कि आप अमेरिकी मुसलमान हैं। आपकी कमर भी खुली है और बाल भी खुले हैं। यह सुनकर मुझे बेइज़्ज़ती का ज़ोर का झटका लगा। एक बच्चा होकर इस तरह से बात कर रहा है ! मैने फ़ौरन सर पर आंचल रखा और पूछा कि अब तो बात कर सकते हैं। फिर उस बच्चे ने बात की, और जब हम जाने लगे तो बच्चे ने धीरे से फ़ारसी में कहा "ख़ानम आप अपनी क़लम मुझे देंगी?" वो बताती हैं -"बचपन में जो फ़साद मैंने देखे उससे दिल में बैठ गया था कि मज़हब सिर्फ़ फ़साद ही कराता है। लेकिन जब मैंने ईरान में काम किया और ईरानी रेवोल्यूशन देखा, तो वहां जो पर्तें इसलाम की खुलीं तो उसके बाद मालूम हुआ कि इस्लाम तो कहीं और है, और लोग कुछ और कहते हैं।" वो समाज कल्याण के लिए भी सतत प्रयत्नशील रहती हैं। पटना में 'किलकारी, बिहार बालभवन' खुलवाने का तारीख़ी काम उन्होंने अंजाम दिया है जिसके लिए बिहारवासी उनके एहसानमंद हैं। पटना जाने के क्रम में हर व्यक्ति को किलकारी का आनंद उठाना चाहिए। किलकारी में पार्क, म्यूजियम, प्लेग्राउंड के अलावा बच्चों को साहित्य व कला से जोड़ने का भी ख़ास इंतज़ाम है। मैंने हाल ही में नासिरा जी की दो कहानियां पढ़ी हैं। 'क़ैद घर' और 'ततइया', इन दोनों ही कहानियों में घर की मालकिन बनीं दो बुज़ुर्ग महिलाओं की ज़िम्मेदारियों, दुश्वारियों, ख्वाहिशों, तमन्नाओं, रुढियों और आशंकाओं का ऐसा सजीव चित्रण नासिरा जी ने किया है जो दूसरे लेखकों के यहाँ नहीं पाया जाता। भाषा ऐसी जो किरदारों के परिवेश के अनुकूल उनके मुंह से फूटती मालूम पड़ती हैं। एक तरफ़ जहाँ मुस्लिम म्आशरे के ऐन मुताबिक़ 'क़ैद घर' में उर्दू ज़बान की शीरीनी मिलती है तो 'ततइया' में दोना पत्तल बनाने वाली बिरादरी की क्षेत्रीय भाषा और हिन्दी की प्रगाढ़ता पायी जाती है। एक पाराग्राफ उनकी कहानी 'तारीख़ी सनद' से - "इंसानी आवाज़ें मशीन गन की आवाज़ों में डूबकर लाशों के अंबार में ढल गई थीं। चिनार के पेड़ों की शाखाओं ने अपनी गर्दनें झुका ली थीं और उनपर बैठी चिड़ियां अपना घोंसला छोड़कर, चीखती जाने किस वीराने की ओर उड़ गई थीं।" यह एक पाराग्राफ ही उनकी भाषा शैली की विशिष्टता से पाठकों को परिचित कराने के लिए काफ़ी है। बहरहाल नासिरा शर्मा जी के व्यक्तित्व और उनके साहित्य संसार पर यदि विधिवत लिखा जाए तो पुरा एक उपन्यास तैयार हो सकता है। उन्होंने इतने सारे काम किए हैं कि सिर्फ़ उन कामों की गिनती भी इस मुख़्तसर मज़मून में कर पाना मुमकिन नहीं है। एकाध मिसालें देखें - उन्होंने विभिन्न फीचर फिल्मों, टीवी फिल्मों, सिरियलों, रेडियो नाटकों, रुपकों वग़ैरह में पटकथा संवाद भी लिखा, निर्देशन भी किया और यहां तक कि अभिनय भी किया। 'अंजुमन' फीचर फिल्म में विधवा तालुकेदारिन का रोल किया, जिसके लेखक डॉ राही मासूम रज़ा और निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली थे। सर सैयद अहमद ख़ान पर बनी डोक्यूमेंट्री में बेगम सर सैयद का रोल किया, जिसके डायरेक्टर प्रोड्यूसर मुश्ताक़ ख़ान थे। सिरियल 'दो बहनें' में मां का रोल किया, जिसके डायरेक्टर शिवकुमार थे। टीवी फिल्मों 'सेमल का दरख़्त', 'काली मोहिनी', 'आया बसंत सखी', 'तड़प', 'बावली', 'तीसरा मोर्चा', 'दिलआरा' में नासिरा शर्मा जी की कहानी और संवाद हैं, तो 'मां' में उनकी लिखी पटकथा एंव संवाद और 'कुंजी' व 'जागृति' में इनके लिखे संवाद हैं। टीवी सिरियलों 'शाल्मली', 'फ़रेब', 'दो बहनें', 'बदला ज़माना', ' चार बहनें शीशमहल की', 'नौ नगों का घर' सहित कई सिरियलों की कथा-पटकथा-संवाद की लेखिका रही हैं नासिरा शर्मा जी। कमाल की शख़्सियत हैं नासिरा शर्मा जी। जीती जागती युनिवर्सिटी। मेरा तो मानना है कि क़ायदे से इनकी शख़्सियत, इनकी लेखनी और इनके कारनामों को पढ लेने वाला शख़्स अपने आप में प्रोफेसर की सलाहियत पा सकता है। सैकड़ों सालों में ईल्म से पुर्नूर ऐसी शख्सियतें ज़मीन पर जन्म लेती हैं। अगर ईमानदारी और निष्पक्षता से कहा जाए तो इस बासलाहियत और बहुरंगी शख़्सियत को "भारत रत्न" से नवाज़ा जाना चाहिए या राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर बिठाया जाना चाहिए। लेकिन चूंकि इनके ख़ून में चमचागीरी, जानिबदारी, जाति-धर्म और गंदी सियासत शामिल नहीं है, इसलिए इन्हें राज्यसभा में भी बिठाए जाने की संभावनाएं कम ही हैं। इनकी रचनाओं की तादाद इतनी ज़्यादा हैं कि ये मज़मून काफ़ी तवील हो जाएगा। सिर्फ़ उनके उपन्यासों के नाम कलमबंद कर रहा हूं - सात नदियाँ एक समंदर , शाल्मली, ठीकरे की मंगनी, ज़ीरो रोड़, ज़िन्दा मुहावरे, अक्षयवट, कुइयांजान, पारिज़ात, अजनबी जज़ीरा, कागज़ की नाव,और हाल ही में लोक भारती प्रकाशन से प्रकाशित, अल्फ़ा बीटा गामा... 'अल्फ़ा बीटा गामा' मनुष्य की आत्मग्रस्तता को कभी कुत्तों की आँखों से दिखाता है, कभी उन कुछ जनों की आँखों से जो अपने सीमित साधनों के साथ, और अपने आस-पड़ोस का विरोध झेलकर उन असहाय जीवों के लिए कुछ करना चाहते हैं। आख़िर में उनके उपन्यास "काग़ज़ की नाव" की बेहद मुख़्तसर सी समीक्षा पेश है - उनका उपन्यास "काग़ज़ की नाव" बिहार में रहने वाले उन परिवारों की कहानी है जिनके घरों से कोई-न-कोई मर्द खाड़ी मुल्कों में नौकरी या मज़दूरी करने गया हुआ है। ये वतन से दूर रहने वाले प्रवासी यहां छोड़ जाते हैं बुज़ुर्गों से लेकर बच्चों तक का भरा-पूरा संसार, खाड़ी मुल्कों से आने वाले रुपये, और रिश्तों के अंधेरे उजाले। यानी ज़रुरतों और ज़िम्मेदारियों के समंदर को चंद रुपयों के सहारे पार करने की कोशिश रहती है। 'काग़ज़ की नाव' उपन्यास महजबीं और अमजद की बड़ी बेटी महलक़ा के पारिवारिक तनाव को केंद्र में रखकर लिखा हुआ है। महलक़ा के ससुर ज़हूर और उसके शौहर ज़ाकिर के बीच भावनाओं का जो चित्रण है, जो संवाद हैं, वो पढ़ने लायक़ है। महजबीं का किरदार कैसा है इस पाराग्राफ से समझा जा सकता है - 'महजबीं ने गहरी सांस ली और अमजद के चेहरे की तरफ़ निगाहें घुमाईं। कुछ पल अंधेरे में टटोलती नज़रों से उन्हें देखती रही फिर आह भरकर दिल ही दिल में कह उठी, ''शाबाश मेरे शेर! ख़ूब झेला मेरी चिंघाडों और तेज़ पंजों की खरोंचों को। अगर कोई और होता मर्द का बच्चा तो ले आता किसी और को, या फिर बिना निकाह के डाल लेता अपनी पसंद की कोई और... लेकिन यह वफ़ादार रहा। मेरी सास ने भी कभी इनको बहकाया और मजबूर नहीं किया। जेठानी ने भी कभी जानबूझकर मुझे नीचा नहीं दिखाया, मगर मुझे हमेशा लगता था कि इनके दिल में खोट है। आख़िर क्यों? क्योंकि मैं इस तरह की हरकतें करती थी? इसकी वजह क्या थी---- और फिर जब महजबीं का हृदय परिवर्तन होता है - " मैं समाज से अलग कहाँ थी। जो तेज़ी से बह रहा था, उसमें बह गई। नदी तो थी नहीं जो रास्ता बदलती। गंदा नाला तो बरसों एक ही तरह से बहता है और मैं बहती रही... अब उस बहाव पर रोक लगाना कितना मुश्किल काम है अमजद, यह आप नहीं जान सकते। क्योंकि आप की मिट्टी अल्लाह ने अलग तरह से गूंधी है और सोने पर सुहागा यह कि आप के वालिदैन ने आप की परवरिश में चुन-चुन कर अच्छाईयां डालीं जो मुझे नसीब नहीं हुईं। "https://alpst-poltics.blogspot.com/2022/05/blog-post.html उपन्यास में नायिका महलक़ा नूर का सबसे मार्मिक चित्रण है। महलक़ा नूर यानी प्रकाश की देवी, जिसकी मां महजबीं ने उसके ज़ेहन और शऊर में तेज़ाब उडेल रखा है। महलक़ा नूर अपने अस्तित्व की रोशनी तलाश कर रही है, उन अंधेरों के बीच जो सदियों से औरत के नसीब का हिस्सा बने हुए हैं। महलक़ा नूर की इस तलाश का अंजाम क्या है, इसे लिखते हुए नासिरा जी ने विमर्श और वृत्तांत की ऊंचाइयों को छू लिया है। मध्यमवर्गीय परिवार की औरतों के नफ़सियात और उनकी ज़ेहनी कश्मकश का बख़ूबी चित्रण इस उपन्यास में मिलता है। बा'ज़ दफ़ा लेखिका छोटी-छोटी बातों का ज़िक्र यूँ कर जाती हैं कि पढ़ने वाले अपने अगल =बग़ल की चीज़ों को ग़ौर से देखने लगते हैं। ये पाराग्राफ देखें - 'महलक़ा ने ज़हूर के कोठरीनुमा कमरे को बैठक बना दिया था और जो कमरा कबाड़खाना बना था, उसे ससुर के लिए ठीक कर दिया था। उसमें खिड़की खुलवा दी थी जिससे बाज़ार की चहल-पहल नज़र आती। बच्चों का कमरा भी सज गया था। जो नया स्टोर रुम बना था उसी में सारा ग़ैर ज़रूरी सामान भर दिया था, ये सोचकर कि साल में एक बार ही इन चीज़ों की ज़रुरत पड़ ही जाती है। नासिरा शर्मा यथार्थ के पथरीले परिदृश्य में उम्मीद की हरी दूब बख़ूबी पहचान लेती हैं। क़िस्सागोई उनका हुनर है। उनके पास बेहद रवां दवां भाषा है। सोने पर सुहागा यह कि इस उपन्यास में तो भोजपुरी भी खिली हुई है। जैसे - गोलू कहता है... "बुढऊ! चहवा पिअबा?" ज़हूर मियां, "हां, पीअब।" आगे गोलू कहता है "आज तहरा पसंद के गोस्त बनल बा।" "हम सांझ के खाना लेके आ जायब।" यक़ीन जानिए भोजपुरी के ये संवाद पढ़ते हुए हम भोजपुरी भाषी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते। बहरहाल ‘काग़ज़ की नाव’ ज़िंदगी और इनसानियत के प्रति हमारे यक़ीन को पुख़्ता करने वाला बेहद ख़ास उपन्यास है। ____________________________________________________________________________ (प्रकाश्य ग्रंथमाला -दो) 'हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान' / संपादक रंजन ज़ैदी। अनेक मोतियों में एक मोती के प्रस्तोता हैं ; हिंदी कथाकार अब्दुल ग़फ़्फ़ार और मोती है डॉक्टर नासिरा शर्मा।
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Beautifull
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