अखरोट के जंगल / रंजन ज़ैदी
अखरोट के जंगल / रंजन ज़ैदी
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रंजन ज़ैदी
उस बूँद का क्या ज़िक्र करूँ जो बेहद साफ़-शफ़्फ़ाफ़ और पाकीज़गी के साथ पहाड़ की बुलंदी पर जमी बर्फ़ का दरवाज़ा लांघकर पहाड़ के गली-गलियारों से होती हुई झरने की शक्ल में घाटी में गिरते ही दरिया बन जाती है.
केवल सूद उसी बूँद का ही तो नाम है जो उसके साहित्य को समुद्र-मंथन की तरफ़ ले जाने की प्रेरणा देता है.
केवल सूद की रचना सलीब 'जॉब के नाटक 'जोफ़र' की तरह है जिसमें सवाल सलीब बनकर सोच के गले में फंदा बनकर रह जाता है.
केवल सूद 'सलीब' के माध्यम से उस अदृश्य बौध्दिक चिंतन, आस्था और भावना की अंतर्दृष्टि की खोज करना चाहता है जिसमें सकल पदार्थों की खोज और उनके विकास की सर्वोच्च सत्ता प्रतिबिंबित होती है. जोफ़र नाटक में पूछता है 'क्या तुम सोचकर ईश्वर का पता नहीं लगा सकते? वह स्वर्ग जितना ऊंचा है, क्या तुम कर सकते हो? उसकी गहराई को तुम जान सकते हो?
'साधना' के पृष्ठ 36 पर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने आनंद को सर्वोच्च-सत्ता से जोड़कर उसके प्रकाश में घुलमिल जाने की प्रक्रिया को सामाजिक व्यवस्था के भीतर ईश्वर की तलाश के बीच सीमित सेवा-क्षेत्र में 'सेवक' का स्थान तलाशा था.
केवल सूद सलीब के रास्ते जख्मखुर्द: रूहों के कानों में सूत्रों, आयतों और ललद्येत के गीतों की तर्ज़ में ज़ाफ़रान की खुशबू से इंसानी खून के बहने का शोर सुनकर सिहर जाते हैं. सलीब का हर पन्ना आज भी ईसा के जीवित होने की गवाही बन जाता है.
जब केवल सूद ने सलीब को संकलित किया था, तब उन्हें अहसास भी नहीं रहा होगा कि वह जो कुछ लिख रहे हैं वह अखरोट के जंगल की आग का रूप धारण कर लेगा..अब उस बूँद से हम क्या कहें जो धरातल में सरस्वती बनकर लोप होने के नज़दीक पहुँच चुकी है.
ISBN : 978-81-920900-4-7
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