समय की वकालत करता एक और कबीर: नीरज/-रंजन ज़ैदी

समय की वकालत करता एक और कबीर: नीरज
    एक ऐसा कवि, गीतकार, शायिर जिसे दुनिया 'नीरज' और दुनिया भर का अदब 'गोपाल दास नीरज' के नाम से जानता है, और जिसके बारे में उर्दू शायिर अहमद रईस का यह शेर तस्वीर उतारता महसूस होता है कि,'लफ्ज़ ही खुशबू, गहने ज़ेवर, सरमाया, / लफ्ज़ चमकते दिल पर लिखना, लिखते रहना......' अच्छा लगता है.
       नीरज भी शायद हम जैसों को इस सोच की लकीर के उस सिरे का कवि लगता है जहाँ शून्य के सिवा और कुछ नज़र नहीं आता लेकिन ध्यान से देखने पर वही शून्य ब्रम्हांड का रूप लेता नज़र आने लगता है जिसमें जीवन भी है, दर्शन भी, दार्शनिक अंतर्दृष्टि भी है और संभावनाओं के पुलसरात भी.  
      दार्शनिक अंतर्दृष्टि जो मनुष्य को उसके होने का अहसास करा सके, अपनी भावनाओं की दुर्लभ संवेदनशीलता के तत्वों का सम्मिश्रण कर उसे अपने नज़रिए से देख और परख सके, उसे स्वर दे सके, धरती को छंदीय गेयता प्रदान कर सके, ताकि जीवन भी गतिशील बना रह सके और भावी पीढ़ियों को वह स्वयं भी गतिशील समय के हर छोर पर अपने गीतों, ग़ज़लों, दोहों, छन्दों और रुबाइयों के उड़नखटोलों पर सदैव आराम करता नज़र आता रहे.
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