समय की वकालत करता एक और कबीर: नीरज/-रंजन ज़ैदी
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| समय की वकालत करता एक और कबीर: नीरज |
नीरज भी
शायद हम जैसों को इस सोच की लकीर के उस सिरे का कवि लगता है जहाँ शून्य के सिवा और
कुछ नज़र नहीं आता लेकिन ध्यान से देखने पर वही शून्य ब्रम्हांड का रूप लेता नज़र आने
लगता है जिसमें जीवन भी है, दर्शन भी, दार्शनिक अंतर्दृष्टि भी है और संभावनाओं के पुलसरात भी.
दार्शनिक
अंतर्दृष्टि जो मनुष्य को उसके होने का अहसास करा सके, अपनी भावनाओं की दुर्लभ संवेदनशीलता
के तत्वों का सम्मिश्रण कर उसे अपने नज़रिए से देख और परख सके, उसे स्वर दे सके, धरती
को छंदीय गेयता प्रदान कर सके, ताकि जीवन भी गतिशील बना रह सके और भावी पीढ़ियों को
वह स्वयं भी गतिशील समय के हर छोर पर अपने गीतों, ग़ज़लों, दोहों, छन्दों और रुबाइयों
के उड़नखटोलों पर सदैव आराम करता नज़र आता रहे.
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