'परिवर्तन आता है तो अपने साथ चुनौतियां भी लेकर आता है-कर्नल कपूर


 'परिवर्तन आता है तो अपने साथ चुनौतियां भी लेकर आता है-कर्नल कपूर
                                                              

(दाएं से बाएं) : रंजन ज़ैदीमीडिया के लेजेंड-मैन कर्नल (रिटायर्डआरकेकपूर
     नोएडा (सार्क-न्यूज़): ग्लोबल लिटेरेरी फेस्टिवल के लगातार तीनों दिन आयोजित किए गए सेमीनारों में विषय वर्तमान संदर्भों को ध्यान में रखकर चुने गए जैसे “ साहित्य: कल, आज और कल, “ सिनेमा, टेलिविजन और साहित्य: चुनौतियाँ और सीमाएं” तथा “वर्तमान संदर्भ में लेखक और पाठक की भूमिका”

      इन सत्रों में देश के जाने माने साहित्यकारों ने भाग लिया जिनमें , चित्रा मुद्गल,  दिविक रमेश, विभूतिनारायण राय, रंजन जैदी और 'फौजी' धारावाहिक का निर्माण करने वाले कर्नल कपूर  और चलचित्रात्मक उपन्यास 'वासना के मुर्दाघर' के प्रकाशक न्द्रेश राजपूत भी  शामिल थे।   
      छोटे परदे के  'फौजी' धारावाहिक के निर्देशक कर्नल (रिटायर्ड) आर. के. कपूर ने फिल्म सिटी स्थित मारवाह स्टूडियो में मनाये गए ग्लोबल लिटरेरी फेस्टिवल-2015 के अंतर्गत हिंदी के वरिष्ठ कथाकार डॉ. रंजन ज़ैदी के सद्य: प्रकाशित (हिंदी) चलचित्रात्मक उपन्यास 'वासना के मुर्दाघर' के लोकार्पण के अवसर पर कहा कि हम लेखक समाज को पुस्तकें इसलिए समर्पित करते हैं, ताकि हमारी बात समाज तक पहुंचे और हम अपने समाज को समझा सकें कि हम उन्हें क्या बताना चाहते हैं. मीडिया के लेजेंड-मैन कर्नल (रिटायर्ड) आर. के. कपूर ने कहा कि 'परिवर्तन समय की जननी है. वह आता है तो अपने साथ अनेक चुनौतियां भी लेकर आता है. उन्होंने कहा कि जो लोग चुनौतियों का सामना कर कामियाबी हासिल करते हैं, उन्हीं में शाहरुख़ खान जैसे फनकार जन्म ले लेते हैं.'
     उन्होंने छोटे परदे पर दिखाए जा रहे व्यावसायिक धारावाहिकों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भारत में आज छोटे परदे पर दिखाये जा रहे न समाप्त होने वाले धरवाहकों में नई परिकल्पनाओं और सामाजिक व शैक्षिक अनुभवों का काफी आभाव है. इसीलिए सोप-ओपेरा की वर्तमान दशा हमारे लिए अब चिंताएं पैदा कर रही हैं. उन्होंने चलचित्रात्मक उपन्यास 'वासना के मुर्दाघर' (रंजन ज़ैदी) पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यद्यपि मैंने ज़ैदी साहब का यह उपन्यास अभी पढ़ा नहीं है लेकिन जितना सुना है, उससे हम इसकी विषयगत गंभीरता का अनुमान लगा सकते हैं. उन्होंने पूरे विश्वास के साथ कहा कि निश्चय ही यह उपन्यास पाठकों को प्रभावित कर अपनी पहचान बनाने में सफल होगा.  

 उपन्यास 'वासना के मुर्दाघर' के लोकार्पण के अवसर पर 
 वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार डॉ. रंजन ज़ैदी ने कहा कि 'आज समय बदल चुका है. आज का बाज़ार छोटे परदे के धारावाहिकों की बैसाखी के सहारे एपीसोड के भीतर तक अपनी पहुँच बना चुका है. उन्होंने कहा कि भारत में सोप-ओपेरा को लाने वाले मनोहर श्याम जोशी का ज़माना अब नहीं रहा है, अब परदे पर 

परिवार, समाज और पैसे का रुतबा दिखाती, सोते हुए भी कलाई में फंसाये मोटे कंगन खनकाती महिलाएं भारतीय समाज का एक अद्भुत और ऐसा कृत्रिम समाज दिखा रही हैं जो कहीं है ही नहीं. उन्होंने कहा कि किटी-पार्टीज़ की महिलाएं 90 दशक में ऐसे दाखिल हुईं कि फेमिनिज़्म की परिभाषा ही बदलकर रह गई.
      अपने समय के बहुचर्चित धारावाहिक 'फ़ौजी' के निर्माता रिटायर्ड कर्नल आर.के.कपूर के विचारों के समर्थन में उन्होंने कहा कि सामाजिक मूल्य संक्रमण की परिधि को तोड़कर जब अपनी निजी पारधि में प्रवेश करते हैं तो सामाजिक बदलाव स्वतः ही समाज को प्रभावित करने लग जाते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे धारावाहिकों का वैश्विक सोच पर यह असर पड़ रहा है कि ‘भारत की संस्कृति और चिंतन में प्रतिशोध लेना आम बात है’. उन्होंने कहा कि अधिकतर धारावाहिकों में सासु माँ द्वारा बहू को शारीरिक व मानसिक यातनाएं देते हुए उन्हें प्रताड़ित करना, पारिवारिक मूल्यों का रूप बिगाड़ना, कलह को जन्म देना आदि कुरीतियां लगातार बढ़ती देखी जा सकती हैं. कपूर साहब के वक्तव्य के हवाले से श्री ज़ैदी ने कहा कि मूक सिनेमा के समय की स्थितियां देविका रानी के समय में बदल चुकी थीं. बदलाव की गति जारी रहती है, सही है. तब बाज़ार मीडिया को आज की तरह निर्देशित नहीं करता था, आज मीडिया पर बाज़ार हावी हो चुका है इसलिए सामाजिक मूल्यों का ह्रास होना स्वाभाविक है.
      डॉ. ज़ैदी ने कहा, आज का मीडिया रातोंरात करोड़पति बन जाना चाहता है. छोटे परदे को 'के. वायरस' ने ग्रस लिया है क्योंकि इस वायरस ने सोप-ओपेरा को नागिनों, जादू-टोनों, ओझाओं के करतबों, बाजार के रंगीन-महंगे उत्पादों, संगीत के महायुद्धों और न समाप्त होने वाली कड़ियों को अपने भोतरे भ्रष्टाचार के औज़ारों से भीतर तक खोखला कर दिया है. उन्होंने कहा कि उनका चलचित्रात्मक उपन्यास 'वासना के मुर्दाघर' संघर्ष की राह दिखाता हुआ महिलाओं, युवाओं और बच्चों को प्रगतिशील भारत के दरवाज़े तक पहुँचाने का प्रयास करता दिखाई देगा.
      वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और मारवाह स्टूडियो में मनाये गए ग्लोबल लिटरेरी फेस्टिवल-2015 के फेस्टिवल-निदेशक डॉ. सुशील भारती ने मीडिया विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मुंबई में बनाये जाने वाले टीवी धारावाहिकों में कहानियाँ इसलिए नहीं होती है क्योंकि उनके लेखक मूलतः साहित्यकार नहीं, बिचौलिए और ब्रोकर होते हैं जिनका काम मैनुप्लेशन कर आर्थिक ज़रूरतमंद से घोष्ठ-राइटिंग कराकर चैनल पर कब्ज़ा करना होता है.     
अपनी चिंता व्यक्त करते हुए सुशील भारती ने कहा कि ऐसी स्थितियों में छोटे परदे के धारावाहिकों का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता क्योंकि यह उद्योग बाजार के क़ब्ज़े में आ चुका है. मुंबई में रहकर अपने अनुभवों का ज़िक्र करते हुए श्री भारती ने कहा कि 'बालिकाबधु' क्या है? मात्र कमीशन का खेल. जो असली लेखक है, वह घोष्ठ है. जो नहीं है वह रोज़गार-क्लब चला रहा है. यह बहुत बड़ी बिडंबना है. इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
      सुशील भारती ने कहा कि इस अवसर पर प्रकाशित (हिंदी) चलचित्रात्मक उपन्यास 'वासना के मुर्दाघर' का लोकार्पण हमारे लिए गौरव का विषय है. वास्तु-स्थिति यह है कि हमें कम समय में बहुत कुछ कर दिखाना था. उनमें 'लोकार्पण' का कार्यक्रम भी एक था. उपन्यास के पन्ने पलटकर जितना मैं देख सका, उतने में ही उसकी महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. इस आयोजन में भाई ज़ैदी जी की सहभागिता हम सबको गर्वान्वित करती है. हम सबकी ओर से उन्हें बहुत-बहुत बधाई.

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