आम आदमी पार्टी अब पोलिटिकल-वॉयरस का शिकार हो चुकी है./ रंजन ज़ैदी
पार्टी के विगठन का
ज़िम्मेदार कोई और नहीं, कुमार
विश्वास, संजय सिंह
और शाज़िआ इल्मी
होंगे। तसल्ली की बात यह है कि शाज़िआ अब पार्टी छोड़ चुकी हैं. लेकिन स्टिंग ऑपरेशन का अज़दहा अभी भी विरोधियों की आस्तीनों से गायब नहीं हुआ है. अजीब बात यह है कि शाज़िआ इल्मी अब अपनी शर्तों पर पार्टी में लौट आने के लिए बेताब भी नज़र आ रही हैं.
अभी भी आधारहीन विचारधारा के मंचीय कवि कुमार विश्वास ने आम आदमी पार्टी नहीं छोड़ी है, जबकि उन्हें पार्टी को अबतक छोड़कर चले जाना चाहिये था। छोटे परदे पर नेता के रूप में बने रहने की ललक ने कुमार विश्वास को ट्वेल्थ-नाइट का पात्र मैलवोलियो बनाकर रख दिया है. अंदर की कहानी वह भलीभांति जानते हैं.
मेरी नज़र में योगेन्द्र यादव (पार्टी में वापस न लौटे तो) ने पार्टी छोड़कर अच्छा कदम उठाया है। यह कदम उन्हें बहुत पहले उठा लेना चाहिए था. यही नहीं बल्कि उन्हें सोच-समझकर राजनीति में आना चाहिये था. वह एक योग्य और बुद्धिजीवी व्यक्ति है, पार्टी के कथित मस्तिष्क कहे जाने वाले वह कैसे भी हों, भ्रष्ट राजनीति के समर्थक कभी नहीं हो सकते। राजनीति का चरित्र ही दूसरा होता है.
विनोद कुमार बिन्नी, मनीष सिसोदिया के गहरे मित्र हैं, 'आप' का टिकट भी उन्हें मनीष के कहने पर दिया गया था. वह एक विशेष उद्देश्य से पार्टी में आये थे. उद्देश्य का खुलासा हुआ तो बात बिगड़ गई और पार्टी से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. वह आगे भी विरोध की राजनीति करते रहे, लेकिन आधारहीन विचारधारा के कारण वह फ्लॉप हो गए. वह समझ ही नहीं पाये कि बीजेपी उनका इस्तेमाल कर रही है. मूलतः विनोद कुमार बिन्नी और मनीष सिसोदिया अंदरूनी तौर पर संघ के बहुत करीब रहे हैं. माना यह भी जाता था कि मनीष सिसोदिया देर-सवेर बीजेपी ज्वायन कर सकते हैं.
अभी भी आधारहीन विचारधारा के मंचीय कवि कुमार विश्वास ने आम आदमी पार्टी नहीं छोड़ी है, जबकि उन्हें पार्टी को अबतक छोड़कर चले जाना चाहिये था। छोटे परदे पर नेता के रूप में बने रहने की ललक ने कुमार विश्वास को ट्वेल्थ-नाइट का पात्र मैलवोलियो बनाकर रख दिया है. अंदर की कहानी वह भलीभांति जानते हैं.
मेरी नज़र में योगेन्द्र यादव (पार्टी में वापस न लौटे तो) ने पार्टी छोड़कर अच्छा कदम उठाया है। यह कदम उन्हें बहुत पहले उठा लेना चाहिए था. यही नहीं बल्कि उन्हें सोच-समझकर राजनीति में आना चाहिये था. वह एक योग्य और बुद्धिजीवी व्यक्ति है, पार्टी के कथित मस्तिष्क कहे जाने वाले वह कैसे भी हों, भ्रष्ट राजनीति के समर्थक कभी नहीं हो सकते। राजनीति का चरित्र ही दूसरा होता है.
विनोद कुमार बिन्नी, मनीष सिसोदिया के गहरे मित्र हैं, 'आप' का टिकट भी उन्हें मनीष के कहने पर दिया गया था. वह एक विशेष उद्देश्य से पार्टी में आये थे. उद्देश्य का खुलासा हुआ तो बात बिगड़ गई और पार्टी से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. वह आगे भी विरोध की राजनीति करते रहे, लेकिन आधारहीन विचारधारा के कारण वह फ्लॉप हो गए. वह समझ ही नहीं पाये कि बीजेपी उनका इस्तेमाल कर रही है. मूलतः विनोद कुमार बिन्नी और मनीष सिसोदिया अंदरूनी तौर पर संघ के बहुत करीब रहे हैं. माना यह भी जाता था कि मनीष सिसोदिया देर-सवेर बीजेपी ज्वायन कर सकते हैं.
लोकसभा के चुनाव
के टिकटों को
लेकर भी देशभर में काफी हंगामे
हुए. कमाने वालों
ने मौके से
खूब फ़ायदा उठाया। कमाई के दौरान केजरीवाल तक पहुँचने के रास्तों पर बैरियर
बनाकर आम आदमियों
की एंट्रीज़ बैन
कर दी गई. दिल्ली का निजी मीडिया चमत्कार को नमस्कार करने में लग गया. भ्रम में केजरीवाल की ऐसी
चली कि वह
दिल्ली की जमुना
छोड़ सपरिवार मैली
गंगा ही नहा आये.
यह केजरीवाल का अप्रत्यक्ष रूप
से हिन्दू कार्ड
था. काशी के
बुनकर नई पार्टी
का ऐसा रूप
और अवतार देखकर हतप्रभ रह
गए. काशी के बुनकरों ने
सोचा, यही कार्ड
खेलना है तो
मोदी क्या बुरे
हैं.वोट जुटा तो वोटर्स ने केजरीवाल के इरादों पर
रोशनाई फेर दी.
बुद्धिजीवियों को केजरीवाल भ्रमित नज़र आने लगे. मोदी कम से कम यह तो कह रहे थे कि बुनकरों को बेरोज़गार नहीं होना पड़ेगा। स्थिति यह थी कि कांग्रेस का महाबली सदस्य बीजेपी से मिल चुका था, उधर दबंग मुख़्तार अंसारी चुनाव की बिसात पर अपने मुकदद्मे का रास्ता साफ़ कर चुके थे. मोदी के वोटों का बहुत आसानी से ध्रुवीकरण हो गया और केजरीवाल बाबाजी का टुल्लू लिए अण्डों की बारिश में बनारस भर में सलाम करते रहे. वह समझ ही नहीं पाये कि अमित शाह ने उनकी बाज़ी पलट दी है. अंततः केजरीवाल राजनीति की बाज़ी हार गए.
पार्टी अब विघटन का शिकार हो चुकी है. उसके कई और नेता अब जाने वाले हैं. ऐसे में समस्या जीतकर आये उन नए सांसदों की है, जो अब सांसत में हैं, कि आपका भविष्य क्या होगा। देर-सवेर या जल्दी ही वे भी किसी निर्णय पर पहुँच जाएंगे।
अब मेरे मित्रों को समझ में आ जाना चाहिए कि शुरू में मैंने पार्टी की सदस्यता लेकर भी उसमें दिलचस्पी क्यों नहीं ली थी ? -रंजन ज़ैदी
-------------------------------------------------------------------------------------------------बुद्धिजीवियों को केजरीवाल भ्रमित नज़र आने लगे. मोदी कम से कम यह तो कह रहे थे कि बुनकरों को बेरोज़गार नहीं होना पड़ेगा। स्थिति यह थी कि कांग्रेस का महाबली सदस्य बीजेपी से मिल चुका था, उधर दबंग मुख़्तार अंसारी चुनाव की बिसात पर अपने मुकदद्मे का रास्ता साफ़ कर चुके थे. मोदी के वोटों का बहुत आसानी से ध्रुवीकरण हो गया और केजरीवाल बाबाजी का टुल्लू लिए अण्डों की बारिश में बनारस भर में सलाम करते रहे. वह समझ ही नहीं पाये कि अमित शाह ने उनकी बाज़ी पलट दी है. अंततः केजरीवाल राजनीति की बाज़ी हार गए.
पार्टी अब विघटन का शिकार हो चुकी है. उसके कई और नेता अब जाने वाले हैं. ऐसे में समस्या जीतकर आये उन नए सांसदों की है, जो अब सांसत में हैं, कि आपका भविष्य क्या होगा। देर-सवेर या जल्दी ही वे भी किसी निर्णय पर पहुँच जाएंगे।
अब मेरे मित्रों को समझ में आ जाना चाहिए कि शुरू में मैंने पार्टी की सदस्यता लेकर भी उसमें दिलचस्पी क्यों नहीं ली थी ? -रंजन ज़ैदी
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