अजय देवगन की फिल्म सन ऑफ़ सरदार/Dr.Ranjan Zaidi


पूनम का चाँद-रंजन जैदी

रंजन जैदी- फिल्म देखी
 अजय देवगन की फिल्म सन ऑफ़ सरदार मैंने तब देखी जब मेरे भतीजे ने ये बताया कि वह इस फिल्म की प्रोडक्शन यूनिट में रहा है। मैंने फिल्म देखी और देखकर हैरत में पड़ गया। जिस कहानी पर ये फिल्म बनी है उसे मैंने 1985 में लिखी थी। उन दिनों मैं राही मासूम रजा के हिंदी उपन्यासों पर शोध कर रहा था। फिल्म सन ऑफ़ सरदार लिखने और पैसा पैदा करने का जुनून भी कम नहीं था। राही ने खुद अलीगढ में कहा था, जब फारिग हो जाओ तो बम्बई आकर मिलना। उन दिनों गीत लिखने का शौक़ था। लेकिन सहाफत ने वक़्त ही नहीं दिया। फिर भी वक़्त निकालकर स्टार, साधना और हिन्द पाकेट बुक्स के लिए पेपर बैक यानि पाकेट-बुक्स लिखता। पॉकेट बुक तो मैं दिल्ली के अलावा मेरठ में भी लिखता था। मेरठ में अरविन्द अरोड़ा, परशुराम शर्मा, मदन सेन जैन और ओमप्रकाश शर्मा के घर रहना, खानापीना हुआ करता था। दिल्ली की मार्केटिंग उन दिनों की दोस्त सुश्री नीना गर्ग देखती थीं। हिंदी-कहानीकार नफीस आफरीदी उन दिनों हिन्द पॉकेट बुक्स में हुआ करते थे। मेरे दोस्त थे। तब तक वह मुझसे हिन्द पॉकेट बुक्स के लिए कई नावेल लिखवा चुके थे और दीना नाथ से मैं मिल भी चुका था, घर भी जा चुका था। नीना गर्ग स्टार पब्लिकेशन के मालिक अमर नाथ से संपर्क रखती थीं। मेरे उपन्यासों के कान्ट्रेक्ट भी वही साइन करती थीं। अनीस अमरोहवी नाविलों को पास किया करते थे। पूनम का चाँद उन्हीं दिनों का उपन्यास है। उन दिनों नामों के ट्रेडमार्क-रजिस्ट्रेशन रजिस्टर्ड हो जाते थे, ये लेखकों के शोषण का एक ख़ुफ़िया रास्ता था। जिसके द्वारा प्रकाशक लाभ उठाया करते थे। बहुत से मुस्लिम अदीबों को प्रकाशक हायर किये हुए थे। समीर, राजवंश, राजहंस, मनोज, कल्पना, अमर और इसी तरह के सैकड़ों नाम थे जिनके मूल लेखक मुस्लिम समुदाय से सम्बन्ध रखते थे। ये कापीराइट पर क़ब्ज़ा करने की प्रकाशक की शातिराना चाल थी। मैं इस चाल को जान गया था। इसलिए हर नोवेल में रंजन जैदी का ज़िक्र होता था। इसके लिए में उपन्यास में कुछ ऐसा छोड़ देता था जो आइन्दा मेरे हितों की रक्षा करे। तब मस्ती के दिन थे। परवाह भी नहीं थी। आज उन्हीं उपन्यासों पर सीरिअल और फ़िल्में बनते देखता हूँ तो तसल्ली होती है। सन ऑफ़ सरदार भी उन्हीं में से एक है। पत्नी श्रीमती नीना गर्ग जैदी ने कहा कि अदालत जाइये। मैंने कहा, अजय देवगन मेरे उपन्यास पूनम का चाँद का नायक बना, मेरे लिए यही काफी है। काजोल बच्ची की तरह है। मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा। पैसा तो मैंने ज़रूररतभर तब भी कमाया था, अब  भी सुकून से हूँ। कहाँ लादकर ले जाना है। यही तो इस उपन्यास में भी दिखाया था। सिक्खों के दो क़बीलों की दुश्मनी मैंने प्यार से जीती थी। अफ़सोस यह है कि अगर स्टोरी-सेशन के दौरान मेरी राय ली गई होती तो ये फिल्म क़यामत की होती। जिसने भी चोरी की, वह निदेशक को इसलिए नहीं समझा पाया की वह स्टोरी के अन्दर तक नहीं जा पाया था। चोर के पावों में आवाज़ भी तो नहीं होती है। उपन्यास के दिल छू लेने वाले कई दृश्य छूट गए। फिर भी मैं खुश हूँ कि बच्चों ने अच्छा काम किया। अजय देवगन और उसके छोटे भाई को मेरी ओर से मुबारकबाद।

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YES or No?




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