हिंदी का एक और लेखक मर गया/रंजन जैदी
हिंदी साहित्य के प्रतिभाशाली लेखक, कवी और एक शानदार इन्सान अमर गोस्वामी, अब इस दुनिया में नहीं रहे। वह जब थे, तो भी नहीं के बराबर ही थे। किसी भी लेखक-पत्रकार के यहाँ मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। हो सकता है, इसपर उनके परिवार के सदस्य प्रकाश डालें। ये एक इबरत का मकाम हैं।
मैं जनता हूँ कि आज कितने ही जाने-माने कवि, लेखक, पत्रकार गंगा के दफ्तर में जब आते थे तो अमर गोस्वामी से मिले बगैर कमलेश्वर जी तक नहीं पहुँचते थे। गोस्वामी जी वहां सहायक संपादक हुआ करते थे। कितने फ्री-लान्सरों का न केवल उन्होंने मार्गदर्शन किया बल्कि गंगा में आलेख या रिपोर्टे प्रकाशित कर उनकी आर्थिक सहायता भी की.
मेरी उनसे पहली मुलाकात लिंक-हॉउस में हुई थी जब गंगा का दफ्तर वहां हुआ करता था। कमलेश्वर जी ने भेंट कराते हुए कहा था कि ये रंजन जैदी हैं, गंगा ने इनकी कहानियां प्रकाशित की हैं।
फिक्र तौंसवी का छटा दरिया (उर्दू में), का अनुवाद कर यह आपको देंगे, अगले अंक से ये धारावाहिक गंगा में छपेगा, आप देख लीजियेगा।
मैं उन्हें दादा कहने लगा था। बेहद शर्मीले, अपने गीले लिहाफ में बंद, सकुचाये से, अरसे बाद खुले तो पता चला कि वह तो कहानीकार भी हैं, उपन्यासकार भी और बच्चों की कहानियाँ लिखने में तो उनका जवाब ही नहीं है।
उनकी बहुत सी कहानियाँ मैं विभिन्न्य पत्र-पत्रिकाओं में देखता रहता था। पुरस्कार भी मिले, लेकिन एक आहिंदी भाषी लेखक के रूप में। मूलतः वह पश्चिमी बंगाल के रहने वाले थे लेकिन वहां उनकी प्रिय भाषा थी।
उन्होंने ही
कहा था की मूलतः मैं हिंदी का लेखक हूँ और संपादन भी हिंदी की पत्रिका का करता हूँ,
लेकिन हिंदी देश के मठाधीश मुझे हिन्दी-भाषी नहीं मानते, क्यों? ये
मठाधीश तो मुस्लिम हिंदी लेखक को भी अहिंदी लेखक मानते
हैं, चाहे वह इसी भाषा में पला-बढ़ा हो। रही मासूम रजा
हिंदी के लेखक थे लेकिन उन्हें साहित्य अकादमी ने पुरस्कार नहीं दिया । खुद मैं
हिंदी का लेखक हूँ, अक्सर समारोहों में लोग पूछते हैं कि
आपका नाम तो सुना है, कुछ अपनी उर्दू
की कहानियां हमें भी दे, ताकि हम अनुवाद करा सकें। इस
आश्चर्य के साथ मैंने समाज कल्याण बोर्ड की हिंदी पत्रिका
'समाज कल्याण' का 20 वर्षों तक संपादन किया और बाद में मुक्ति हासिल करली। यानि जो छप रहा है,
वह कोई नहीं पढ़ रहा है। जब कोई पढ़ेगा ही नहीं तो रंजन जैदी को कौन जानेगा?
अमर गोस्वामी कितने भी बड़े लेखक हों, कोई
उन्हें मान्यता नहीं देगा। क्योंकि हम आमिर खां या अमिताभ बच्चन नहीं हैं और न ही
हमें सेल्फ मार्केटिंग आती है. प्रसून जोशी इसलिए बड़े कवी या गीतकार हैं क्योंकि उनके पास विज्ञापन देने की क्षमता है। कल
नहीं रहेगी तो लोग भूल जायेंगे।
अमर गोस्वामी की मौत एक नसीहत है कि ये दुनिया सराये-फ़ानी है, यहाँ हर चीज़ आनी-जानी है। यहाँ कुछ नहीं रहने वाला। बस वह इंसानियत
कभी नहीं मरेगी जो इन्सान के साथ जुडी होगी। ऐसा लेखक अब
इस दुनिया में नहीं है, लेकिन किसी अख़बार
ने भी ये खबर नहीं प्रकाशित की कि हिंदी का एक और लेखक मर गया.
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