अखिलेश की राज्य के प्रशासन पर पकड़ मज़बूत बनी रही तो...2./डॉ. रंजन जैदी

अखिलेश यादव, आज़म खान,राज्यपाल तथा शिशुपाल यादव
यह सच है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति देश के भविष्य की राजनीति तय करती है . समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के सीएम की गद्दी सौंप कर एसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव  ने राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछा दी है. अब यह गेम वही जीत सकेगा जिसे खेल खेलना आता होगा. बहुत जल्द मुलायम सिंह यादव अपनी सायकिल पर सवार होकर पार्टी के काफले के साथ केंद्र के राजनीतिक गलियारे में चहलकदमी करते हुए नज़र आएंगे. अब भविष्य की राजनीति का मोहरा वहीं से चला जायेगा. तीसरे फ्रंट की संभावनाओं को पंख लगने में देर नहीं है. यह माना भी जा रहा है कि मुलायम सिंह के खेमे में उनके साथ गैर-कांग्रेसियों को आने में संकोच नहीं होगा क्योकि नेता जी ( मुलायम सिंह ) के संबंध लगभग सभी से एक  जैसे  हैं और वे मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव के साथ अभी कंधे से कंधा मिलाने की स्थिति में नहीं हैं क्योकि उनकी उम्र मात्र ३८ साल की है और राजनीति में भी अभी यह उनकी पहली विजय है जिसमें नेता जी की राजनीतिक-पृष्ठभूमि का काफी योगदान माना जा सकता है. आगामी लोकसभा के चुनाव (२०१४) में क्षेत्रीय राजनीतिक बाहुबली चाहेंगे कि तीसरा फ्रंट उन्हें केंद्र की सत्ता तक पहुँचाने  में मददगार साबित हो. इनमें चाहे जयललिता हों या चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक हों या शरद पवार, नितीश कुमार हों या ममता बनर्जी या शेख अब्दुल्लाह..., मुलायम सिंह यादव उनके इस सपने को साकार करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं. क्षेत्रीय राजनीति में उलझे रहने से समाजवादी पार्टी का युवा धड़ा सफोकेशन महसूस कर सकता है. यह युवा कार्यशैली के लिए भी घातक  सिद्ध होगा. क्योंकि अभी उसमें कुछ कर गुजरने का उत्साह बना हुआ है और पढ़े-लिखे इस युवा वर्ग से अपराधी व माफिया छिटके हुए हैं लेकिन वे गाफिल नहीं हुए हैं. उनका अखिलेश मंडली में सेंध लगाना जारी रहेगा. इसी तरह दागी नेताओं का असर-रुसूख और उनके अपराधी कारनामों पर लगाम लगाना भी  नए मंत्रिमंडल  की कार्यशैली के सामने बहुत बड़ी चुनौती होगी. देखा जाये तो अखिलेश यादव की मंजिल आसान नहीं है, फिर भी युवा नेतृत्व को अपना आधार तो मज़बूत करना ही होगा. इसके लिए केंद्रीय राजनीति का समर्थन ज़रूरी होगा. ऐसी स्थिति में तीसरे फ्रंट की  अहमियत का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है. इस सिलसिले में केंद्र में यूपीए की सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश में चलाई जा रही योजनाओं पर जो पैसा आवंटित हुआ है और जो आगे भी होगा, उसपर नई सरकार को निगाह रखना होगा क्योंकि स्वैच्छिक क्षेत्र आज भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है जहाँ केंद्र से चला अनुदान का एक रूपया १५ पैसे में तब्दील हो जाता है. मनरेगा जैसी योजनायें इसका सबूत हैं और राज्य समाज कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाएं इसकी एजेंसियां हैं जिन्हें केंद्र के नेताओं और उच्च सरकारी अधिकारियों का समर्थन और आशीर्वाद प्राप्त है.  भ्रष्टाचार के ड्रैगन राज्य में कम नहीं हैं. मायावती की सरकार अपने शासनकाल में उन्हें निरंतर पुष्पित और पल्लवित करती रही है. बीजेपी भी कम अवरोध नहीं खड़े करेगी. उसका एजेंडा स्पष्ट है. जब नया सीएम अपने एजेंडे पर अमल करने की दृष्टि से राज्य के कमज़ोर और पिछड़े वर्ग के मुसलमानों के विकास पर काम करना शुरू करेगा तो बीजेपी मुस्लिम तुष्टिकरण का नारा लगाने लग जाएगी. मायावती-ब्रिगेड भी शांति से नहीं बैठेगी. इन सबको अपराधियों का साथ भी मिलता रहेगा. ऐसे हालात में अखिलेश यादव को अच्छे और प्रबुद्ध राजनैतिक सलाहकारों और ईमानदार, योग्य व कर्मठ अफसरों की टीम की ज़रूरत होगी जिसमें निर्णय लेने की भरपूर क्षमता हो और राज्य के प्रति ज़िम्मेदारी उठाने का जज्बा भी. कांग्रेस को भले ही राज्य में नाकामी मिली हो, वह समाजवादी पार्टी से खुद को अधिक समय तक दूर नहीं रख पायेगी. यह सोच नई सरकार को एक तरह की शक्ति प्रदान करेगी.                  Mob; 9350934635      alpsankhyaktimes94gzb.com,   www.dw-world.de/hindi

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